आलोचकों की नज़र में पता नहीं की ग़ज़ल ने कितनी बंदिशे निभायी है.पर मुझे आपका अंदाज़े बयां अच्छा लगा, मुझको तसल्ली देती रही वक्ते रुख़सती पर पर्चा दवा का हाथ में, शीशी ज़हर की थी। इस शे'र में नवीनता और मौलिकता है.
पिछली ग़ज़ल में जीवन दर्शन नज़र आता है.जिंदा लोगो को जीते ज़ी कुछ नसीब नहीं होता मरे लोगो के नाम पे हम कुछ भी कर गुजरते है. तन ढको उनका जो ज़िन्दा हैं, बेलिबास भी हैं तुम क़फ़न मेंरा मेरे क़द के बराबर रखना. आपकी कविताओ में भी काव्य क्षेत्र में आपकी प्रतिभा का परिचय मिलता है. नाफिज़ा पर टिप्पणी पोस्ट नहीं हो रही इस लिए यहाँ लिख रही हूँ.
आलोचकों की नज़र में पता नहीं की ग़ज़ल ने कितनी बंदिशे निभायी है.पर मुझे आपका अंदाज़े बयां अच्छा लगा,
ReplyDeleteमुझको तसल्ली देती रही वक्ते रुख़सती पर
पर्चा दवा का हाथ में, शीशी ज़हर की थी।
इस शे'र में नवीनता और मौलिकता है.
पिछली ग़ज़ल में जीवन दर्शन नज़र आता है.जिंदा लोगो को जीते ज़ी कुछ नसीब नहीं होता मरे लोगो के नाम पे हम कुछ भी कर गुजरते है.
तन ढको उनका जो ज़िन्दा हैं, बेलिबास भी हैं
तुम क़फ़न मेंरा मेरे क़द के बराबर रखना.
आपकी कविताओ में भी काव्य क्षेत्र में आपकी प्रतिभा का परिचय मिलता है.
नाफिज़ा पर टिप्पणी पोस्ट नहीं हो रही इस लिए यहाँ लिख रही हूँ.